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How the Karnataka High Court missed the forests for the trees | Bar & Bench

  Certain remarks of Karnataka High Court in the Cauvery Calling case are controversial not only because of a poor understanding of ecology but may also leave a negative impact on environmental jurisprudence. The High Court of Karnataka while dismissing a public interest litigation (PIL) petition against the ‘Cauvery Calling’ project, observed that the only remedy available to save mankind and planet earth is afforestation, which is being carried out by the Isha Foundation for which they must be appreciated. The Cauvery Calling project which was launched by Isha Foundation in July 2019 aims at planting 242 crore trees in Karnataka and Tamil Nadu in the next 12 years. The PIL, however, did not question the merits of the project but was filed to obtain a stay on it on the grounds that the organisers are........ Read more on Bar & Bench
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आफ़त क्यों बन रही है बारिश? (कवर स्टोरी) दैनिक भास्कर

  मानसून आते ही मुंबई, दिल्ली और चेन्नई जैसे महानगर ही नहीं, बल्कि पटना,भागलपुर, वाराणसी, भोपाल जैसे छोटे शहरों के भी 'पानी-पानी' होने की खबरें सुर्खियां बनने लगती हैं। अब मानसून केवल बारिश नहीं ला रहा, बल्कि महानगरों, शहरों से लेकर कस्बों तक में बाढ़ भी ला रहा है। इससे न केवल भारी वित्तीय क्षति पहुंच रही है, बल्कि कई लोगों को हर साल जान से हाथ भी धोना पड़ता है। नीति आयोग द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार बाढ़ की वजह से देश को हर साल औसतन 5,649 करोड़ रुपए और 1,654 मानव जीवन का नुकसान होता है। ऐसे में अगर हमने बाढ़ रोकने के पर्याप्त प्रबंध नहीं किए तो आने वाले सालों में बारिश से होने वाली आपदाएं देश के लिए भारी तबाही ला सकती है। शुरुआत तो हो ही गई है। जानते हैं कि आखिर देश में बाढ़ जैसे हालात क्यों बन रहे हैं और इसका क्या असर हो रहा है। 'भारी वर्षा दिवस' बढ़ रहे हैं , क्योंकि बदल रहा है मानसून का पैटर्न... सरकारी आंकड़ों और विशेषज्ञों की माने तो भारत में हर साल होने वाली मानसूनी बारिश की मात्रा में तो वार्षिक रूप से कोई खास फर्क नहीं आया है, लेकिन मानसून के स्वरूप में फर्क

क्यों जल रहे हैं हमारे जंगल? (कवर स्टोरी) दैनिक भास्कर

  उत्तराखंड, ओडिशा से लेकर मप्र के कई जंगलों में आग लगी हुई है। इस मौसम में जंगलों में आग की घटनाएं सामान्य होती हैं, लेकिन गर्मी के पूरे चरम पर पहुंचने से पहले ही इन घटनाओं में असामान्य बढ़ोतरी चिंताजनक है। जंगलों में लगने वाली आग अब एक महत्वपूर्ण वैश्विक घटना बन चुकी है जिसकी वजह से हर साल विभिन्न देशों को पर्यावरणीय क्षति के साथ-साथ भारी आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है। पिछले कुछ सालों के दौरान जंगलों में लगने वाली आग की घटनाओं में एकाएक तेजी देखने को मिली है और ये घटनाएं अब एक तरह से वार्षिक आपदाओं में तब्दील होती दिख रही है। भारत के जंगल भी इसका तेजी से शिकार हो रहे हैं। वैश्विक स्तर पर वनों की निगरानी रखने वाली संस्था- ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच के अनुसार इस साल 4 जनवरी से 12 अप्रैल 2021 के बीच करीब 100 दिन में ही सिर्फ भारत में ही जंगलों में आग के 15,170 मामले सामने आ चुके हैं जो पिछले वर्ष की तुलना में कहीं ज्यादा हैं। इनमें हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, झारखंड, असम और बिहार को जंगली आग से प्रभावित शीर्ष पांच राज्य बताया गया है। जंगलों की आग और जलवायु परिवर्तन का दुष्चक्र ... भारतीय वन सर्वे

Bare Truth: Why We Need to Save Our Sloth Bears | Roundglass Sustain

This nocturnal bear, with powerful claws, is one of the most feared animals of the Indian jungle and yet its survival is threatened It’s evening time, don’t go towards that hill, the bear will maul you” ( Bhaiya shaam ho gayi, us pahadi par mat jaiyega, bhaluwa pakad leg ), two passers-by returning with heavy loads of fuelwood on their shoulders warned me. I was surprised and curious and wanted to ask more questions, but they were in a hurry. It was the first time I’d heard of the presence of bears in the forests of Mirzapur. It was 2010 and I was pursuing my master's from Banaras Hindu University’s south campus located in the forested landscapes of Mirzapur. Surprisingly, when I discussed the incident with faculty members, no one had a clue, and instead, students were asked not to venture out into forests without a teacher’s permission. However, that didn’t affect me much and I was ever more curious to know more about the bears. My research led me to learn about the sloth bear and

The Man who Saved a Forest | Sacred Groves

When as a student, Debadityo Sinha saw the forest he loved threatened by the proposed construction of a mega thermal power project, he used an evidence-based advocacy approach to stop the rich private corporation in its tracks! T hink about it. Though 25 per cent of India’s landmass is under forest cover, only five percent is protected for wildlife conservation! I realised this while I was in Banaras Hindu University’s South Campus in 2009, pursuing a Master’s degree in Environmental Science. Our campus was surrounded by the rich wilderness areas of Mirzapur that fell, as most of India’s lesser-known wildlife areas do, under the category of ‘Reserve Forest’ – owned and managed by the state government. As students, we spent all our free time exploring these forests which seemed to us no less than a..... Read More on Sacred Groves 

क्यों बिगड़ रहा है मौसम का मिज़ाज? (कवर स्टोरी) दैनिक भास्कर

इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक का अंतिम साल यानी 2020 वैश्विक महामारी के लिए जाना जाएगा, लेकिन कम लोगों को ही जानकारी होगी कि यह पृथ्वी के इतिहास में सबसे गरम दशक (2010-2020) की समाप्ति के रूप में भी याद रखा जाएगा। और अब तो नासा की ताजा रिपोर्ट के अनुसार 2020 इतिहास के सबसे गर्म साल के रूप में भी दर्ज हो गया है। यह जलवायु परिवर्तन का सीधा नतीजा है जो ‘चरम मौसमी घटनाओं’ की संख्या में बढ़ोतरी के रूप में भी सामने आ रहा है। सरल भाषा में कहें तो साधारण तूफान अब चक्रवात का रूप धारण कर रहे हैं, सूखा व बाढ़ जैसी घटनाएं अब बार-बार व अधिक विकराल रूप लेती जा रही हैं और शीतलहर व भीषण गर्मी वाले मौसम अब पहले से कहीं ज्यादा और अनियमित होते जा रहे हैं। इस साल कश्मीर में रिकॉर्ड बर्फबारी, पंजाब-दिल्ली में कड़ाकेदार सर्दी और उसके विपरीत मप्र, महाराष्ट्र, गुजरात का ठंड के लिए तरस जाना इसी के उदाहरण माने जा सकते हैं। क्या है चरम मौसम? वर्ल्ड मीटियोरॉलोजिकल ऑर्गनाइजेशन के अनुसार चरम मौसम (एक्स्ट्रीम वेदर) उसे कहते हैं, जिसमें कोई मौसम जैसे ठंड या गर्मी अथवा बारिश अपने अतीत के रिकॉर्ड्स को तोड़ देता है या जिस क्षे

Covid proved that India needs a dedicated Wildlife Protection Authority | The Print

Studies show that 72 per cent of zoonotic diseases like Covid originate in wildlife, which is why it’s crucial to conserve natural habitats. T he conservation of wildlife in its habitat has assumed greater importance because of Covid-19, as studies indicate that   60 per cent of Emerging Infectious Diseases   — such as HIV, Ebola, SARS, Covid-19 — affecting humans are zoonotic. Approximately 72 per cent of these originate in wildlife. Wildlife habitats, which include Protected Areas and other categories of landscapes rich in wilderness, are also important life-supporting systems that play a critical role in ensuring food and water security, climate change resilience, and natural hazard regulation, among several other   ecological, economical and cultural services . Read the article on 'The Print '